Monday, 10 August 2026

भारतीय आर्यभाषाएँ एवं आर्येतर भाषाएँ


प्रस्तावना:

भारतीय आर्यभाषाएँ भारत-ईरानीभाषा की एक उपशाखा है। यह दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल तथा श्रीलंका में बोली जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे बड़ा भाषा-परिवार है। यह भारत और नेपाल की राष्ट्रभाषा के साथ ही पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी कई भाषाओं का आधार है।

भारतीय आर्यभाषाएँ

भारतीय आर्यभाषाओं की जननी संस्कृत मानी जाती है। भारतीय आर्यभाषाएँ वैदिक संस्कृत से विकसित हुई हैं। प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ कालांतर में प्राकृत, अपभ्रंश तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं में परिवर्तित हुईं। आज हिन्दी सहित अनेक आधुनिक भारतीय भाषाएँ इसी भाषा-परिवार से संबंधित हैं।

भारतीय आर्य भाषाओं का विकासक्रम

भारतीय आर्यभाषाओं के विकासक्रम को मुख्यतः तीन कालों में विभाजित किया जाता है—

  1. प्राचीन काल
  2. मध्यकाल
  3. आधुनिक काल

इन्हीं तीनों कालों की भाषाओं का अध्ययन भारतीय आर्यभाषाओं के विकासक्रम के अंतर्गत किया जाता है.


(1) प्राचीन भारतीय आर्य-भाषाएँ


प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का अनुमानित समय ई.पू. 2000 से ई.पू. 500 तक माना गया है। इन भाषाओं का स्वरूप हमें दो भागों में देखने को मिलता है—

  • वैदिक संस्कृत
  • लौकिक संस्कृत


(I) वैदिक संस्कृत

वैदिक संस्कृत का अनुमानित समय ई.पू. 2000 से ई.पू. 800 तक माना जाता है। प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का प्राचीनतम नमूना वैदिक साहित्य में दिखाई देता है। वैदिक साहित्य का निर्माण वैदिक संस्कृत में हुआ है। वैदिक संस्कृत को छांदस, वैदिकी, वैदिक तथा छन्दस् आदि नामों से भी जाना जाता है। वैदिक साहित्य में संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद का समावेश होता है।


(II) लौकिक संस्कृत

लौकिक संस्कृत, वैदिक संस्कृत का सरल रूप है। इसका अनुमानित समय ई.पू. 800 से ई.पू. 500 तक माना जाता है। इस भाषा को क्लासिकल संस्कृत भी कहते हैं। यह बोलचाल की भाषा नहीं है।

संस्कृत या वैदिक संस्कृत के साहित्य में ऋग्वेद प्रमुख ग्रंथ है। इसका भौगोलिक क्षेत्र सप्तसिंधु को माना जाता है। हिमालय के दक्षिण की ओर फैला हुआ क्षेत्र, जिसमें पंजाब की पाँचों नदियों के साथ सरस्वती नदी भी सम्मिलित थी, ऋग्वेद का मुख्य क्षेत्र माना जाता है।


संस्कृत को देववाणी भी कहा गया है। इस भाषा में व्याकरण तथा महाकाव्य, नाटक, कथासाहित्य, गद्य, दर्शन आदि रचे गए हैं। इसके अतिरिक्त वेदांग, स्मृति साहित्य, काव्यशास्त्र, आयुर्वेद, वैज्ञानिक साहित्य, पौराणिक साहित्य, दर्शन आदि साहित्य आता है।


(2) मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषाएँ


मध्यकालीन भारतीय भाषा का समय ई.पू. 500 से ई. सन् 1000 तक माना जाता है। इस समय की भाषाओं को तीन भागों में विभाजित किया गया है—

  • पालि
  • प्राकृत
  • अपभ्रंश

मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषा की तीनों भाषाएँ संस्कृत भाषा का ही रूप हैं। इन्हें तीनों रूपों के बारे में चर्चा हम आगे करेंगे।

(1) पालि

पाली मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा है। इसका समय ई.पू. 500 से ई. 100 तक माना गया है। पालि मुख्य रूप से बौद्ध धर्म की भाषा मानी गयी है। बौद्ध धर्म का समस्त ज्ञान इसी भाषा में संचित है। पालि का अर्थ बुद्ध वचन है। यह खरे/शुद्ध रूप से चैनल की मूल भाषिक परम्परा से संबंधित हुआ है। पालि भाषा में त्रिपिटक की रचना हुई है। त्रिपिटक के संकलन ग्रंथ हैं—


  • सुत्त पिटक
  • विनय पिटक
  • अभिधम्म पिटक

(2) प्राकृत

मध्यकालीन युग की प्रादेशिक भाषा को प्राकृत भाषा कहा जाता है। मध्यकालीन समय में इसका प्रमुख कालखंड ई.पू. 500 से ई. 800 तक माना जाता है। यह प्राकृत (प्राकृतिक) जनभाषा है। प्राकृत शब्द का निर्माण प्रकृति शब्द से हुआ है। जिसका अर्थ प्रकृति की बनी हुई होता है।


(3) अपभ्रंश

अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ "भ्रष्ट" या रूप का बिगड़ा हुआ स्वरूप होता है। यह मध्यकालीन युग के अंतिम भाग में बोली जाने वाली भाषा है।

अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ "भ्रष्ट" या रूप का बिगड़ा हुआ स्वरूप होता है। अपभ्रंश का समय ई. 500 से ई. 1000 माना गया है। अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से मानी जाती है और इसी से भूतकाल तथा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं (जैसे– हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया आदि) का विकास हुआ।


(3) आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ


आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास लगभग ई. 1000 में हुआ। आधुनिक भाषाएँ अपभ्रंश का विकसित रूप मानी जाती हैं। आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में हिन्दी, सिंधी, लहन्दा, पंजाबी, गुजराती, मराठी, असमिया, उड़िया, कोंकणी आदि प्रमुख भाषाएँ हैं। इन भाषाओं को लोकभाषाएँ कहा जाता है।


भारतीय आर्येतर भाषाएँ

भारत देश की भाषाओं का विशाल भंडार पाया जाता है। यहाँ की भाषा की विविधता विश्व में अद्वितीय है। भारतीय भाषाओं को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया जाता है—

  • भारतीय आर्य भाषाएँ
  • भारतीय आर्येतर भाषाएँ

जो भाषाएँ आर्य भाषा समूह से उत्पन्न हुई हैं, उन्हें आर्य भाषाएँ कहा जाता है तथा जो भाषाएँ आर्य भाषाओं से उत्पन्न नहीं हुई हैं, उन्हें आर्येतर भाषाएँ कहा जाता है।

भारतीय आर्येतर भाषाओं की विशेषता यह है कि वे भारत की प्राचीनतम और मूलभूत भाषाएँ हैं। ये भारत के आर्य भाषाओं के आगमन से पहले से प्रचलित थीं। इन भाषाओं ने भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी विविधता को समृद्ध किया है। आर्येतर भाषाओं के कारण इतनी व्यापकता और समृद्धि है।


भारतीय आर्येतर भाषाएँ मुख्य रूप से निम्नलिखित भाषा-परिवारों में देखने को मिलती हैं—

  1. द्रविड़ भाषा-परिवार
  2. ऑस्ट्रिक भाषा-परिवार (मुंडा)
  3. तिब्बती-चीनी भाषा-परिवार
  4. अंडमानी भाषा-परिवार

(1) द्रविड़ भाषा-परिवार

आर्येतर भाषाओं में द्रविड़ भाषाओं का विशेष महत्व है। यह परिवार भारत की द्वितीय सबसे प्रमुख भाषा-परिवार है। दक्षिण भारत की चार बड़ी भाषाएँ— तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम— इसी परिवार की भाषाएँ हैं। इसके अलावा तुलु, कोडगु जैसी भाषाएँ भी इसमें आती हैं।

तमिल भाषा का सबसे प्राचीन जीवित भाषा होने का प्रमाण मिलता है। द्रविड़ भाषाओं का प्रभाव उत्तर भारत की भाषाओं पर भी पड़ा है।


(2) मुंडा या ऑस्ट्रिक भाषा-परिवार

भारत के आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएँ मुख्य रूप से मुंडा परिवार से संबंधित मानी जाती हैं। खड़िया आदि भाषाएँ ऑस्ट्रिक भाषाएँ इस परिवार की शाखाएँ हैं। ये भाषाएँ मुख्यतः झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और बंगाल के आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। संथाली आज भी व्यापक रूप से बोली जाने वाली जनजातीय भाषा है।


(3) तिब्बती-चीनी भाषा-परिवार

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और हिमालयी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएँ मुख्यतः तिब्बती-चीनी भाषा-परिवार से संबंधित हैं। बोडो, नागा, मिजो, मणिपुरी (मैतेई) आदि भाषाएँ प्रमुख हैं। इन भाषाओं में स्वर का विशेष महत्व होता है।


(4) अंडमानी भाषा-परिवार

भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की मूल भाषाएँ अंडमानी परिवार से संबंधित हैं। इनमें ग्रेट अंडमानी, ओंगे, जारवा और सेंटिनली भाषाएँ प्रमुख हैं। ये भाषाएँ अत्यंत सीमित क्षेत्रों और जनजातियों तक सीमित हैं। वर्तमान समय में इन भाषाओं का अस्तित्व संकट में है। क्योंकि आधुनिक संपर्क, साधनों और संचार के विकास से इनका प्रयोग बहुत कम हो गया है।


निष्कर्ष / उपसंहार


भारत भाषायी दृष्टि से अत्यन्त विविधताओं वाला देश है। भारतीय आर्य और आर्येतर भाषा-परिवार भारतीय भाषा-संपदा के महत्वपूर्ण अंग हैं। हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि भाषाएँ जहाँ आर्य भाषाओं में आती हैं, वहीं द्रविड़, मुंडा, तिब्बती-चीनी और अंडमानी भाषाएँ आर्येतर भाषाओं में आती हैं।


आर्य भाषाओं का शास्त्रीय साहित्य और ज्ञान-परंपरा का स्वरूप समृद्ध है, जबकि आर्येतर भाषाएँ लोकजीवन और क्षेत्रीय संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। दोनों भाषा-समूह भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता का महत्वपूर्ण आधार हैं।

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