प्रस्तावना
भाषा मनुष्य के विचारों, भावनाओं, अनुभवों और ज्ञान को व्यक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। भाषा का निर्माण अनेक शब्दों से होता है। जब दो या दो से अधिक वर्ण एक निश्चित अर्थ प्रदान करते हुए मिलते हैं, तो शब्द का निर्माण होता है और इन्हीं शब्दों के व्यवस्थित प्रयोग से वाक्य तथा भाषा का निर्माण होता है। इसलिए शब्दों को किसी भी भाषा की आधारभूत इकाई माना जाता है।
हिंदी एक समृद्ध और विकसित भाषा है। इसके शब्द-भंडार में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, विभिन्न भारतीय बोलियों तथा अरबी, फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेज़ी, पुर्तगाली आदि विदेशी भाषाओं के शब्दों का योगदान रहा है। यही विविधता हिंदी भाषा को व्यापक, जीवंत और अभिव्यक्तिपूर्ण बनाती है।
हिंदी भाषा में उपलब्ध शब्दों के समूह को व्यापक अर्थ में ‘शब्द-भंडार’ कहा जाता है। दूसरी ओर, शब्दों को उनके अर्थ, उच्चारण, वर्तनी, पर्यायवाची, विलोम, व्युत्पत्ति और प्रयोग आदि के साथ क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने वाले ग्रंथ या संग्रह को ‘शब्दकोश’ कहा जाता है।
शब्द-भंडार क्या है?
हिंदी भाषा में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न प्रकार के शब्दों का विशाल संग्रह हिंदी का शब्द-भंडार कहलाता है। इसमें सामान्य शब्दों के साथ-साथ पर्यायवाची, विलोम, अनेकार्थी, एकार्थी, समरूपी भिन्नार्थक शब्द तथा अनेक शब्दों के लिए प्रयुक्त एक शब्द आदि शामिल होते हैं।
शब्दों का वर्गीकरण
हिंदी के शब्दों को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है। प्रमुख रूप से इन्हें निम्न आधारों पर समझा जा सकता है—
- अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद
- प्रयोग की दृष्टि से शब्द-भेद
- उत्पत्ति की दृष्टि से शब्द-भेद
1. अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद
अर्थ की दृष्टि से शब्द मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—
- सार्थक शब्द
- निरर्थक शब्द
(क) सार्थक शब्द
जिन शब्दों का कोई निश्चित अर्थ होता है और जिनके प्रयोग से किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान, गुण, क्रिया या भाव का बोध होता है, उन्हें सार्थक शब्द कहते हैं।
उदाहरण:
किताब, कुर्सी, मोबाइल, विद्यालय, विद्यार्थी, पानी, घर, पेड़, सुंदर, चलना आदि।
वाक्य में प्रयोग:
विद्यार्थी किताब पढ़ रहा है।
यहाँ ‘विद्यार्थी’ और ‘किताब’ दोनों सार्थक शब्द हैं क्योंकि दोनों का स्पष्ट अर्थ है।
(ख) निरर्थक शब्द
जिन वर्णों या ध्वनियों के समूह का अपने आप में कोई निश्चित अर्थ नहीं होता, उन्हें निरर्थक शब्द कहा जाता है। इनका प्रयोग प्रायः किसी सार्थक शब्द के साथ बोलचाल में किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए किसी बच्चे की बातचीत में ‘चाय-वाय’, ‘खाना-वाना’ जैसे प्रयोग मिल सकते हैं। यहाँ ‘चाय’ और ‘खाना’ सार्थक शब्द हैं, जबकि ‘वाय’ और ‘वाना’ का स्वतंत्र अर्थ नहीं है।
2. प्रयोग की दृष्टि से शब्द-भेद
प्रयोग की दृष्टि से शब्दों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है—
(क) विकारी शब्द
जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन, पुरुष या कारक आदि के कारण परिवर्तन हो सकता है, उन्हें विकारी शब्द कहा जाता है।
विकारी शब्दों के चार प्रमुख प्रकार हैं—
- संज्ञा
- सर्वनाम
- विशेषण
- क्रिया
लिंग के कारण परिवर्तन
लड़का खेल रहा है।
लड़की खेल रही है।
यहाँ ‘रहा’ और ‘रही’ में लिंग के अनुसार परिवर्तन हुआ है।
वचन के कारण परिवर्तन
लड़का खेलता है।
लड़के खेलते हैं।
यहाँ एकवचन से बहुवचन होने पर शब्द के रूप में परिवर्तन हुआ है।
कारक के कारण परिवर्तन
वह आदमी नौकरी करता है।
उस आदमी को नौकरी करने दो।
यहाँ कारक के अनुसार ‘वह’ का ‘उस’ तथा वाक्य में अन्य रूपों का परिवर्तन दिखाई देता है।
(ख) अविकारी शब्द
जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन, पुरुष या कारक आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता, उन्हें अविकारी शब्द कहा जाता है।
अविकारी शब्दों के प्रमुख प्रकार हैं—
- क्रिया-विशेषण
- संबंधबोधक
- समुच्चयबोधक
- विस्मयादिबोधक
उदाहरण:
धीरे-धीरे, बहुत, यहाँ, वहाँ, परंतु, तथा, और, लेकिन, अरे!, वाह! आदि।
वाक्य:
वह धीरे-धीरे चलता है।
राम और श्याम विद्यालय गए।
इन शब्दों का रूप सामान्यतः लिंग या वचन के अनुसार नहीं बदलता।
3. उत्पत्ति की दृष्टि से शब्द-भेद
हिंदी शब्द-भंडार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसकी ऐतिहासिक और भाषायी विविधता है। उत्पत्ति के आधार पर हिंदी के शब्द मुख्यतः चार प्रकार के माने जाते हैं—
- तत्सम शब्द
- तद्भव शब्द
- देशज शब्द
- विदेशी शब्द
(क) तत्सम शब्द
- ‘तत्सम’ का अर्थ है— ‘उसके समान’।
- संस्कृत के वे शब्द जो लगभग अपने मूल रूप में हिंदी में प्रयुक्त होते हैं, तत्सम शब्द कहलाते हैं।
उदाहरण:
अग्नि
सूर्य
रात्रि
मुख
नयन
दाँत? — नहीं, इसका तत्सम ‘दन्त’ है
कर्म
विद्यालय
पुस्तक
पुष्प
इन शब्दों में संस्कृत के मूल रूप की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
(ख) तद्भव शब्द
- ‘तद्भव’ का अर्थ है— ‘उससे उत्पन्न’।
- संस्कृत के वे शब्द जो समय के साथ ध्वनि और रूप में परिवर्तन होकर हिंदी में प्रचलित हुए, तद्भव शब्द कहलाते हैं।
तत्सम तद्भव
अग्नि आग
दन्त दाँत
दुग्ध दूध
कर्ण कान
नासिका नाक
मुख मुँह
हस्त हाथ
ग्राम गाँव
रात्रि रात
सूर्य सूरज
तत्सम और तद्भव शब्द हिंदी की ऐतिहासिक विकास-यात्रा को समझने में बहुत उपयोगी हैं।
(ग) देशज शब्द
जो शब्द भारतीय भाषायी परिवेश, स्थानीय बोलियों अथवा लोकभाषाओं से हिंदी में आए हैं और जिनकी उत्पत्ति संस्कृत से स्पष्ट रूप से नहीं मानी जाती, उन्हें सामान्यतः देशज शब्द कहा जाता है।
उदाहरण:
खटिया, लोटा, पगड़ी, डोंगा, ठुमरी, खिचड़ी आदि।
देशज शब्द हिंदी को लोकजीवन, ग्रामीण संस्कृति और क्षेत्रीय भाषायी परंपराओं से जोड़ते हैं।
(घ) विदेशी शब्द
जो शब्द अन्य देशों और भाषाओं के संपर्क से हिंदी में आए और हिंदी के सामान्य प्रयोग का हिस्सा बन गए, उन्हें विदेशी शब्द कहा जाता है।
हिंदी ने विभिन्न भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं
अंग्रेज़ी से आए शब्द
स्कूल
डॉक्टर
हॉस्पिटल
पेन
पेंसिल
कार
कंप्यूटर
टेलीफोन
टिकट
ट्रक
अरबी से आए शब्द
किताब
तारीख
कीमत
किस्मत
अमीर
गरीब
इलाज
वकील
मदद
मतलब
फ़ारसी से आए शब्द
बाज़ार
दरवाज़ा
ज़मीन
दोस्त
रंग
आवाज़
तुर्की से आए शब्द
तोप
चाकू
बेगम
बारूद
काबू
चीनी से आए शब्द
चाय
लीची जैसे कुछ शब्द भारतीय भाषाओं में बाहरी भाषायी संपर्क से आए हैं।
इस प्रकार विदेशी शब्दों ने हिंदी के शब्द-भंडार को और अधिक व्यापक बनाया है।
हिंदी शब्द-भंडार में विविध भाषाओं का योगदान
हिंदी का शब्द-भंडार किसी एक भाषा की देन नहीं है। इसके विकास में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, क्षेत्रीय बोलियों तथा अनेक विदेशी भाषाओं का योगदान रहा है।
हिंदी के विकास को समझने के लिए उसके शब्दों की यात्रा को समझना महत्वपूर्ण है। एक ही वस्तु या भाव के लिए हिंदी में अलग-अलग स्रोतों से आए शब्द मिल सकते हैं। यही भाषायी विविधता हिंदी को अभिव्यक्ति के अनेक अवसर प्रदान करती है।
उदाहरण के लिए हिंदी में ‘पुस्तक’ जैसा तत्सम शब्द और ‘किताब’ जैसा विदेशी मूल का शब्द दोनों प्रचलित हैं। इसी प्रकार ‘गृह’ और ‘घर’ जैसे शब्द भाषा के ऐतिहासिक परिवर्तन को दिखाते हैं।
निष्कर्ष
हिंदी भाषा का शब्द-भंडार अत्यंत व्यापक, विविध और निरंतर विकसित होने वाला है। तत्सम और तद्भव शब्द हिंदी के संस्कृत से जुड़े इतिहास को दर्शाते हैं, देशज शब्द भारतीय लोकजीवन और क्षेत्रीय भाषाओं की उपस्थिति को सामने लाते हैं, जबकि विदेशी शब्द हिंदी की व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क-परंपरा को व्यक्त करते हैं।
शब्द-भंडार केवल शब्दों का संग्रह नहीं है; यह किसी भाषा के इतिहास, संस्कृति, समाज, विचार और विकास का प्रतिबिंब भी है। शब्दकोश इन शब्दों को व्यवस्थित रूप में समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
इसलिए हिंदी भाषा को अच्छी तरह समझने और प्रभावी ढंग से प्रयोग करने के लिए उसके शब्द-भंडार का अध्ययन आवश्यक है। जितना समृद्ध हमारा शब्द-ज्ञान होगा, उतनी ही प्रभावशाली हमारी भाषा और अभिव्यक्ति होगी।
अंततः कहा जा सकता है कि शब्द भाषा की आधारशिला हैं और शब्द-भंडार उस भाषा की समृद्धि का परिचायक है।

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