भारतीय आर्यभाषाएँ एवं आर्येतर भाषाएँ
प्रस्तावना:
भारतीय आर्यभाषाएँ भारत-ईरानीभाषा की एक उपशाखा है। यह दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल तथा श्रीलंका में बोली जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे बड़ा भाषा-परिवार है। यह भारत और नेपाल की राष्ट्रभाषा के साथ ही पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी कई भाषाओं का आधार है।
भारतीय आर्यभाषाएँ
भारतीय आर्यभाषाओं की जननी संस्कृत मानी जाती है। भारतीय आर्यभाषाएँ वैदिक संस्कृत से विकसित हुई हैं। प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ कालांतर में प्राकृत, अपभ्रंश तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं में परिवर्तित हुईं। आज हिन्दी सहित अनेक आधुनिक भारतीय भाषाएँ इसी भाषा-परिवार से संबंधित हैं।
भारतीय आर्य भाषाओं का विकासक्रम
भारतीय आर्यभाषाओं के विकासक्रम को मुख्यतः तीन कालों में विभाजित किया जाता है—
-
प्राचीन काल
-
मध्यकाल
-
आधुनिक काल
इन्हीं तीनों कालों की भाषाओं का अध्ययन भारतीय आर्यभाषाओं के विकासक्रम के अंतर्गत किया जाता है.
(1) प्राचीन भारतीय आर्य-भाषाएँ
प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का अनुमानित समय ई.पू. 2000 से ई.पू. 500 तक माना गया है। इन भाषाओं का स्वरूप हमें दो भागों में देखने को मिलता है—
- वैदिक संस्कृत
- लौकिक संस्कृत
(I) वैदिक संस्कृत
वैदिक संस्कृत का अनुमानित समय ई.पू. 2000 से ई.पू. 800 तक माना जाता है। प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का प्राचीनतम नमूना वैदिक साहित्य में दिखाई देता है। वैदिक साहित्य का निर्माण वैदिक संस्कृत में हुआ है। वैदिक संस्कृत को छांदस, वैदिकी, वैदिक तथा छन्दस् आदि नामों से भी जाना जाता है। वैदिक साहित्य में संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद का समावेश होता है।
(II) लौकिक संस्कृत
लौकिक संस्कृत, वैदिक संस्कृत का सरल रूप है। इसका अनुमानित समय ई.पू. 800 से ई.पू. 500 तक माना जाता है। इस भाषा को क्लासिकल संस्कृत भी कहते हैं। यह बोलचाल की भाषा नहीं है।
संस्कृत या वैदिक संस्कृत के साहित्य में ऋग्वेद प्रमुख ग्रंथ है। इसका भौगोलिक क्षेत्र सप्तसिंधु को माना जाता है। हिमालय के दक्षिण की ओर फैला हुआ क्षेत्र, जिसमें पंजाब की पाँचों नदियों के साथ सरस्वती नदी भी सम्मिलित थी, ऋग्वेद का मुख्य क्षेत्र माना जाता है।
संस्कृत को देववाणी भी कहा गया है। इस भाषा में व्याकरण तथा महाकाव्य, नाटक, कथासाहित्य, गद्य, दर्शन आदि रचे गए हैं। इसके अतिरिक्त वेदांग, स्मृति साहित्य, काव्यशास्त्र, आयुर्वेद, वैज्ञानिक साहित्य, पौराणिक साहित्य, दर्शन आदि साहित्य आता है।
(2) मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषाएँ
मध्यकालीन भारतीय भाषा का समय ई.पू. 500 से ई. सन् 1000 तक माना जाता है। इस समय की भाषाओं को तीन भागों में विभाजित किया गया है—
मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषा की तीनों भाषाएँ संस्कृत भाषा का ही रूप हैं। इन्हें तीनों रूपों के बारे में चर्चा हम आगे करेंगे।
(1) पालि
पाली मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा है। इसका समय ई.पू. 500 से ई. 100 तक माना गया है। पालि मुख्य रूप से बौद्ध धर्म की भाषा मानी गयी है। बौद्ध धर्म का समस्त ज्ञान इसी भाषा में संचित है। पालि का अर्थ बुद्ध वचन है। यह खरे/शुद्ध रूप से चैनल की मूल भाषिक परम्परा से संबंधित हुआ है। पालि भाषा में त्रिपिटक की रचना हुई है। त्रिपिटक के संकलन ग्रंथ हैं—
- सुत्त पिटक
- विनय पिटक
- अभिधम्म पिटक
(2) प्राकृत
मध्यकालीन युग की प्रादेशिक भाषा को प्राकृत भाषा कहा जाता है। मध्यकालीन समय में इसका प्रमुख कालखंड ई.पू. 500 से ई. 800 तक माना जाता है। यह प्राकृत (प्राकृतिक) जनभाषा है। प्राकृत शब्द का निर्माण प्रकृति शब्द से हुआ है। जिसका अर्थ प्रकृति की बनी हुई होता है।
(3) अपभ्रंश
अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ "भ्रष्ट" या रूप का बिगड़ा हुआ स्वरूप होता है। यह मध्यकालीन युग के अंतिम भाग में बोली जाने वाली भाषा है।
अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ "भ्रष्ट" या रूप का बिगड़ा हुआ स्वरूप होता है। अपभ्रंश का समय ई. 500 से ई. 1000 माना गया है। अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से मानी जाती है और इसी से भूतकाल तथा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं (जैसे– हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया आदि) का विकास हुआ।
(3) आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ
आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास लगभग ई. 1000 में हुआ। आधुनिक भाषाएँ अपभ्रंश का विकसित रूप मानी जाती हैं। आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में हिन्दी, सिंधी, लहन्दा, पंजाबी, गुजराती, मराठी, असमिया, उड़िया, कोंकणी आदि प्रमुख भाषाएँ हैं। इन भाषाओं को लोकभाषाएँ कहा जाता है।
भारतीय आर्येतर भाषाएँ
भारत देश की भाषाओं का विशाल भंडार पाया जाता है। यहाँ की भाषा की विविधता विश्व में अद्वितीय है। भारतीय भाषाओं को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया जाता है—
- भारतीय आर्य भाषाएँ
- भारतीय आर्येतर भाषाएँ
जो भाषाएँ आर्य भाषा समूह से उत्पन्न हुई हैं, उन्हें आर्य भाषाएँ कहा जाता है तथा जो भाषाएँ आर्य भाषाओं से उत्पन्न नहीं हुई हैं, उन्हें आर्येतर भाषाएँ कहा जाता है।
भारतीय आर्येतर भाषाओं की विशेषता यह है कि वे भारत की प्राचीनतम और मूलभूत भाषाएँ हैं। ये भारत के आर्य भाषाओं के आगमन से पहले से प्रचलित थीं। इन भाषाओं ने भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी विविधता को समृद्ध किया है। आर्येतर भाषाओं के कारण इतनी व्यापकता और समृद्धि है।
भारतीय आर्येतर भाषाएँ मुख्य रूप से निम्नलिखित भाषा-परिवारों में देखने को मिलती हैं—
- द्रविड़ भाषा-परिवार
- ऑस्ट्रिक भाषा-परिवार (मुंडा)
- तिब्बती-चीनी भाषा-परिवार
- अंडमानी भाषा-परिवार
(1) द्रविड़ भाषा-परिवार
आर्येतर भाषाओं में द्रविड़ भाषाओं का विशेष महत्व है। यह परिवार भारत की द्वितीय सबसे प्रमुख भाषा-परिवार है। दक्षिण भारत की चार बड़ी भाषाएँ— तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम— इसी परिवार की भाषाएँ हैं। इसके अलावा तुलु, कोडगु जैसी भाषाएँ भी इसमें आती हैं।
तमिल भाषा का सबसे प्राचीन जीवित भाषा होने का प्रमाण मिलता है। द्रविड़ भाषाओं का प्रभाव उत्तर भारत की भाषाओं पर भी पड़ा है।
(2) मुंडा या ऑस्ट्रिक भाषा-परिवार
भारत के आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएँ मुख्य रूप से मुंडा परिवार से संबंधित मानी जाती हैं। खड़िया आदि भाषाएँ ऑस्ट्रिक भाषाएँ इस परिवार की शाखाएँ हैं। ये भाषाएँ मुख्यतः झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और बंगाल के आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। संथाली आज भी व्यापक रूप से बोली जाने वाली जनजातीय भाषा है।
(3) तिब्बती-चीनी भाषा-परिवार
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और हिमालयी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएँ मुख्यतः तिब्बती-चीनी भाषा-परिवार से संबंधित हैं। बोडो, नागा, मिजो, मणिपुरी (मैतेई) आदि भाषाएँ प्रमुख हैं। इन भाषाओं में स्वर का विशेष महत्व होता है।
(4) अंडमानी भाषा-परिवार
भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की मूल भाषाएँ अंडमानी परिवार से संबंधित हैं। इनमें ग्रेट अंडमानी, ओंगे, जारवा और सेंटिनली भाषाएँ प्रमुख हैं। ये भाषाएँ अत्यंत सीमित क्षेत्रों और जनजातियों तक सीमित हैं। वर्तमान समय में इन भाषाओं का अस्तित्व संकट में है। क्योंकि आधुनिक संपर्क, साधनों और संचार के विकास से इनका प्रयोग बहुत कम हो गया है।
निष्कर्ष / उपसंहार
भारत भाषायी दृष्टि से अत्यन्त विविधताओं वाला देश है। भारतीय आर्य और आर्येतर भाषा-परिवार भारतीय भाषा-संपदा के महत्वपूर्ण अंग हैं। हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि भाषाएँ जहाँ आर्य भाषाओं में आती हैं, वहीं द्रविड़, मुंडा, तिब्बती-चीनी और अंडमानी भाषाएँ आर्येतर भाषाओं में आती हैं।
आर्य भाषाओं का शास्त्रीय साहित्य और ज्ञान-परंपरा का स्वरूप समृद्ध है, जबकि आर्येतर भाषाएँ लोकजीवन और क्षेत्रीय संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। दोनों भाषा-समूह भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता का महत्वपूर्ण आधार हैं।
वैदिक संस्कृत एवं उसकी विशेषताएँ
प्राचीन भारतीय भाषा वैदिक संस्कृत और उसकी विशेषताओं के बारे में चर्चा कीजिए।
पूर्वभूमिका :
सभी भारतीय आर्य भाषाओं की जननी संस्कृत है। विश्व का सबसे पुराना साहित्य भी इसी भाषा में मिलता है। प्राचीन समय में भारतीय आर्य भाषाओं का उद्भव संस्कृत से माना गया है। और वही आगे चलकर मध्यकाल में पाली, प्राकृत और अपभ्रंश का रूप लेने लगे, जो आधुनिक समय तक आते-आते कई आधुनिक भाषाओं में बंट जाते हैं।
भारतीय आर्य भाषाओं का वर्गीकरण :
भारतीय आर्य भाषाओं का वर्गीकरण तीन भागों में किया जाता है—
1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ
वैदिक संस्कृत
लौकिक संस्कृत
2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ
पाली
प्राकृत
अपभ्रंश
3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ
हिंदी
बांग्ला
सिंधी
नेपाली
गुजराती
मराठी
असमिया
उड़िया
इन भारतीय आर्य भाषाओं के निर्माण के आधार पर हम प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं में से वैदिक संस्कृत को सर्वप्रथम समझने की कोशिश करते हैं।
वैदिक संस्कृत
वैदिक संस्कृत प्राचीनतम भारतीय आर्यभाषा है। इसे वैदिकी, वैदिक तथा छांदस्य भी कहा जाता है। इसका समय लगभग ई.पू. 2000 से ई.पू. 800 तक माना गया है। प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का प्राचीनतम नमूना वैदिक-संस्कृत में दिखाई देता है। वैदिक साहित्य का सृजन वैदिक संस्कृत में हुआ है।
भारत की धार्मिकता का मूल-बीज वेद ही हैं, जो वैदिक ऋषियों के अनुभवों का संकलन है। भारतीय आर्य भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा को माना जाता है। वेद की भाषा और वैदिक साहित्य को समझना है। वैदिक साहित्य को चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है—
- संहिता
- ब्राह्मण
- आरण्यक
- उपनिषद
अतः ऋग्वेद, ब्राह्मण एवं आरण्यक तथा उपनिषद आदि की मूल भाषा को ही वैदिक संस्कृत कहते हैं।
वैदिक संस्कृत का साहित्य
(1) संहिता (वेद)
संहिता ऐसे ग्रंथ हैं जिनमें वेदों के मौखिक मंत्रों का संकलन है। संहिता चार हैं—
- ऋग्वेद संहिता
- साम संहिता
- यजु संहिता
- अथर्व संहिता
सारा हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रंथ वेदों का भाग वाला खण्ड है। ये वैदिक संस्कृत का प्रथम हिस्सा है जिसमें काव्य रूप में देवताओं की यज्ञ के लिए स्तुति की गयी है।
ऋग्वेद संहिता :
ऋग्वेद संहिता को विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है। इसका रचनाकाल ई.पू. 6000 से भी अधिक प्राचीन है। इसलिए पाश्चात्य को ‘हिंदू’ या ‘वेद’ कहते हैं। ‘ऋक्’ का अर्थ है—स्तुति करना। इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त एवं 10580 ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद में मुख्यतः यज्ञ के अनुष्ठान पर पढ़ने योग्य देवताओं की स्तुतियों से संबंधित रचनात्मक काव्य है।
साम संहिता :
साम संहिता में साम गानों में गाये जाने वाले सूक्तों को वेद पद्य के रूप में सजाया गया है। सामवेद में लगभग 75 मंत्र हैं। शेष ऋग्वेद से लिये गये हैं। सामवेद संहिता के दो भाग हैं—
सामवेद के पंडित को उद्गाता कहा जाता है।
यजुर्वेद संहिता :
यजुर्वेद संहिता में यज्ञ के कर्मकाण्ड में उपयोग में आने वाले गद्य तथा पद्य मंत्रों का संग्रह है। यजुर्वेद संहिता के दो रूप हैं—
- कृष्ण यजुर्वेद संहिता
- शुक्ल यजुर्वेद संहिता
कृष्ण यजुर्वेद संहिता में मंत्र भाग है एवं मध्यम व्याख्यात्मक भाग साथ-साथ संकलित किये गए हैं। परंतु शुक्ल यजुर्वेद संहिता में केवल मंत्र भाग संग्रहित है। शुक्ल यजुर्वेद संहिता में 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मंत्र हैं। इसमें अलग-अलग तत्त्वज्ञान का वर्णन है।
ऋग्वेद संहिता में लगभग 663 मंत्र यजुर्वेद में मिलते हैं। इसमें यज्ञों का विवरण भी है— अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, राजसूय एवं अग्निचयन।
अथर्व संहिता :
अथर्व संहिता में हिन्दू धर्म के पवित्रतम वेदों में से चौथा वेद अथर्ववेद की संहिता है। इसे ब्रह्मवेद भी कहते हैं। इसमें देवताओं की स्तुति के साथ चिकित्सा-विज्ञान और दर्शन के भी मंत्र मिलते हैं। अथर्ववेद में 5,687 मंत्रों को 20 अध्यायों में बाँटा गया है। इसमें साधारण जन में प्रचलित मंत्र-तंत्र, टोने-टोटके का भी वर्णन है।
अथर्व संहिता आयुर्वेद में अनेक प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों के वर्णन हेतु महत्वपूर्ण है। इस प्रकार जीवन को व्यवस्थित करने के नियम एवं मान-मर्यादाओं का उत्तम विवेचन इसमें मिलता है। इसमें ब्रह्म की उपासना संबंधी बहुत-से मंत्र मिलते हैं।
(2) ब्राह्मण
वेदों को गद्य में समझाने वाले ग्रंथ को ‘ब्राह्मण’ कहा जाता है। समय की दृष्टि से ब्राह्मण वैदिक संस्कृत का दूसरा भाग है। इसमें गद्य स्वरूप में देवताओं की तथा यज्ञ की व्याख्या की गयी है और मंत्रों का अर्थ भी दिया गया है। ब्राह्मण में ब्राह्मणकाण्ड की व्याख्या की गई है। प्रत्येक संहिता के अपने-अपने ब्राह्मण ग्रंथ होते हैं। जैसे निम्नलिखित समझ सकते हैं—
- ऋग्वेद संहिता — ऐतरेय ब्राह्मण
- साम संहिता — पंचविंश ब्राह्मण / ताण्ड्य ब्राह्मण
- यजुर्वेद संहिता
- शुक्ल यजुर्वेद संहिता — शतपथ ब्राह्मण
- कृष्ण यजुर्वेद संहिता — तैत्तिरीय ब्राह्मण
- अथर्ववेद संहिता — गोपथ ब्राह्मण
ब्राह्मण ग्रंथों की संख्या 13 है। ऋग्वेद संहिता के लिए 2, साम संहिता के 5, यजुर्वेद संहिता के 5 और अथर्व संहिता के लिए 1 ब्राह्मण का निर्माण किया गया है।
(3) आरण्यक
वेद का वह भाग जिसमें यज्ञ, अनुष्ठान की पद्धति यांत्रिक मंत्र, पदार्थ एवं फल आदि से आध्यात्मिकता का संकेत दिया गया है, वह ‘आरण्यक’ है। वानप्रस्थाश्रम में संसार-त्याग को उपरांत अरण्य में अध्ययन होने के कारण भी इन्हें ‘आरण्यक’ कहा गया। कोई-कोई संबंध आवश्यक निम्नलिखित है—
ऐतरेय संहिता — ऐतरेय आरण्यक, कौषीतकि आरण्यक
यजुर्वेद संहिता — बृहदारण्यक, तैत्तिरीय आरण्यक
साम संहिता — जैमिनीय आरण्यक
आरण्यकों की संख्या 6 है। अथर्व संहिता का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है। संस्कृत में वन को अरण्य कहते हैं। इसलिए अरण्य में उत्पन्न हुए ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है।
(4) उपनिषद
ब्राह्मण ग्रंथों के अंतिम भाग उपनिषद के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें वैदिक मंत्रों के आध्यात्मिक एवं परमाधिक चिंतन के दर्शन होते हैं। उपनिषदों की संख्या 108 बताई गई है, किन्तु 12 उपनिषद ही मुख्य हैं—
- ईशावास्योपनिषद
- केनोपनिषद
- मुण्डकोपनिषद
- तैत्तिरीयोपनिषद
- छान्दोग्योपनिषद
- श्वेताश्वतरोपनिषद
- कठोपनिषद
- ऐतरेयोपनिषद
- माण्डूक्योपनिषद
- बृहदारण्यकोपनिषद
- ऐतरेयोपनिषद
- कौषीतकी उपनिषद
आदि गुरु शंकराचार्य ने उपरोक्त में से 10 उपनिषदों पर टीका लिखी थी। सबसे छोटा उपनिषद माण्डूक्योपनिषद है और सबसे बड़ा उपनिषद बृहदारण्यकोपनिषद है।
वैदिक संस्कृत की ध्वनियाँ
संस्कृत विद्वानों ने वैदिक ध्वनियों की संख्या 52 मानी है, जिसमें 13 स्वर तथा 39 व्यंजन हैं। पाणिनि ने वैदिक स्वरों की संख्या 14 मानी है।
वैदिक स्वर (संख्या : 13)
मूल स्वर:
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ
संयुक्त स्वर:
ए, ऐ, ओ, औ
वैदिक व्यंजन (संख्या : 39)
उच्चारण स्थान | अघोष | घोष | अनुनासिक |
कण्ठ्य | क, ख | ग, घ | ङ |
तालव्य | च, छ | ज, झ | ञ |
मूर्धन्य | ट, ठ | ड, ढ | ण |
दन्त्य | त, थ | द, ध | न |
ओष्ठ्य | प, फ | ब, भ | म |
इसके अलावा वैदिक संस्कृत में अन्तःस्थ स्थान में ‘य, र, ल, व’ का समावेश होता है और ऊष्मण ध्वनि— श, ष, स एवं ह जैसे व्यंजन हैं। ‘क’, ‘त’ आदि अनुस्वार भी हैं, जिनमें विभाजनस्थानीय स्थान एवं उपस्थानिक स्थान का समावेश होता है।
वैदिक संस्कृत की विशेषताएँ
- वैदिक संस्कृत में कुल 52 ध्वनियाँ हैं, जिसमें 13 स्वर तथा 39 व्यंजन हैं।
- वैदिक संस्कृत में लिंग तीन हैं— पुल्लिंग, स्त्रीलिंग एवं नपुंसकलिंग।
- इसमें वचन की तीन श्रेणियाँ हैं— एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन।
- इसमें विभक्तियाँ आठ की— कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध, अधिकरण एवं संबोधन।
- विभक्तियों के रूप भी संज्ञा की तरह ही पाये जाते हैं।
- वैदिक संस्कृत की पदरचना में विविधता तथा अनेक रूपता देखने को मिलती है।
- वैदिक संस्कृत में क्रिया के रूप तीन पुरुषों में मिलते हैं— प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष एवं उत्तम पुरुष।
- वैदिक संस्कृत में क्रिया के रूप 11 प्रकार के रूपों में मिलते हैं।
- शब्दों में संज्ञात्मक रूप मुख्य रूप से मिलते हैं।
- वैदिक संस्कृत में समास रचना भी देखने को मिलती है। इसमें मुख्य रूप से तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि एवं द्वंद्व समास मिलते हैं।
- वैदिक संस्कृत में धातुओं के रूप आत्मनेपद एवं परस्मैपद में चलते थे।
सारांश
वैदिक संस्कृत भारतीय संस्कृति और सभ्यता की आधारशिला है। यह न केवल प्राचीन वैदिक साहित्य की भाषा थी, बल्कि धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंतन की मूल प्रेरणा भी बनी। इसकी विशिष्टता छंद, स्वर और उच्चारण की शुद्धता में है। वैदिक संस्कृत ने आगे चलकर लौकिक संस्कृत को जन्म दिया है और भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा को मार्ग प्रदान किया। इस प्रकार वैदिक संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा और ज्ञान-विज्ञान की मूल जड़ कही जा सकती है।
लौकक संस्कृत और उसकविशेषताएँ
प्रस्तावना:
लौकिक संस्कृत को सामान्यतः 800 ई.पू. से 500 ई.पू. का काल माना जाता है। यह वह भाषा है जिसका पाणिनि की अष्टाध्यायी में विधिवत् वर्णन मिलता है। ‘अष्टाध्यायी’ संस्कृत व्याकरण का सबसे महत्वपूर्ण और आज तक का सबसे तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक ग्रंथ है। पाणिनि ने जिस संस्कृत रूप का विश्लेषण किया, वही आगे चलकर लौकिक संस्कृत कहलाया।
लौकिक संस्कृत साहित्य
लौकिक संस्कृत में वेदांग, रामायण, महाभारत, नाटक, काव्य, उपवेद (आयुर्वेदादि), कथा साहित्य, वैज्ञानिक साहित्य एवं पौराणिक साहित्य, उपांग (दर्शन) आदि साहित्य आता है। अर्थात कह सकते हैं जो भी साहित्य वैदिक साहित्य के बाद संस्कृत में रचा गया, लौकिक संस्कृत साहित्य कहलाता है।
सभी वेदों की भाषा "वैदिक संस्कृत" ही है, किन्तु अंतिम वेद से वह संस्कृत "लौकिक संस्कृत" की ओर उन्मुख हो गई है, जिसे संधिकाल कहते हैं। इसी काल में रामायण और महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों की रचना हुई, जिसे "आरंभिक लौकिक साहित्य" माना जाता है। इसी दौरान ही (500-400 ई.पू.) संस्कृत व्याकरण के सुविख्यात लेखक 'पाणिनि' का जन्म हुआ, जिन्होंने अपने समय में प्रचलित संस्कृत भाषा का व्यापक शोध करके 'अष्टाध्यायी' नामक ग्रन्थ में भाषा-सम्बधी नियम बनाए। जो वर्तमान युग की संस्कृत का आधार ग्रंथ हैं।
लौकिक संस्कृत की विशेषताएँ
लौकिक संस्कृत (Classical Sanskrit) वह भाषा है जिसका प्रयोग रामायण, महाभारत और कालिदास जैसे कवियों की रचनाओं में मिलता है। पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' ने इसे व्याकरण के नियमों में बाँधकर एक निश्चित स्वरूप प्रदान किया। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. व्याकरणिक स्थिरता
लौकिक संस्कृत पूरी तरह से पाणिनि के व्याकरण नियमों पर आधारित है। वैदिक संस्कृत की तुलना में इसमें अनिश्चितता कम है और रूप निश्चित हैं। इसमें 'विकल्प' (Options) की सुविधा बहुत कम हो गई है।
2. ध्वन्यात्मक परिवर्तन
वैदिक संस्कृत की तुलना में लौकिक संस्कृत में ध्वनियों की संख्या कम हो गई।
वैदिक संस्कृत के 'ळ' और 'ळ्ह' जैसी ध्वनियाँ लौकिक संस्कृत में लुप्त हो गईं।
इसमें केवल 48 ध्वनियाँ शेष रहीं।
3. शब्द रूप और धातु रूप में सरलता
वैदिक संस्कृत में शब्दों के अनेक रूप बनते थे, लेकिन लौकिक संस्कृत में उन्हें सीमित कर दिया गया।
'लेट्' लकार (जो केवल वेदों में प्रयुक्त होता था) का प्रयोग लौकिक संस्कृत में समाप्त हो गया। अब केवल 10 लकारों का प्रयोग होता है।
4. संधि के नियम
लौकिक संस्कृत में संधियों का प्रयोग अनिवार्य और अधिक व्यवस्थित हो गया। विशेषकर पद के भीतर और समास में संधि के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाने लगा।
5. समासों की प्रधानता
लौकिक संस्कृत में बड़े-बड़े समासों का प्रयोग होने लगा। विशेषकर बाणभट्ट जैसे कवियों की गद्य रचनाओं में अत्यंत लंबे सामासिक पद देखने को मिलते हैं, जो भाषा को अलंकृत और संक्षिप्त बनाते हैं।
6. शब्द भंडार में परिवर्तन
कई वैदिक शब्दों का अर्थ बदल गया या वे अप्रचलित हो गए।
अनार्य भाषाओं (द्रविड़ और कोल) के अनेक शब्द लौकिक संस्कृत के शब्दकोश में शामिल हो गए।
इसमें नए पारिभाषिक शब्दों का विकास हुआ।
7. संगीतात्मकता का अभाव
वैदिक संस्कृत 'स्वराघात' (Accent) प्रधान थी, जहाँ उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का बहुत महत्व था। लौकिक संस्कृत में यह संगीतात्मक स्वराघात समाप्त हो गया और इसका स्थान 'बलाघात' (Stress) ने ले लिया।
8. साहित्य की विविधता
लौकिक संस्कृत केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रही। इसमें काव्य, नाटक, दर्शन, गणित, आयुर्वेद और राजनीति शास्त्र जैसे विविध विषयों पर विशाल साहित्य रचा गया।
सारांश
लौकिक संस्कृत वैदिक संस्कृत के बाद विकसित हुई संस्कृत का व्यवस्थित और निश्चित रूप है, जिसका व्याकरणिक आधार पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ है। इसमें रामायण, महाभारत, काव्य, नाटक, दर्शन, आयुर्वेद, विज्ञान और पौराणिक साहित्य जैसी विभिन्न विधाओं का विकास हुआ। वैदिक संस्कृत की तुलना में लौकिक संस्कृत में व्याकरणिक स्थिरता, ध्वनियों में कमी, शब्द एवं धातु रूपों की सरलता और संधि-समास के निश्चित नियम दिखाई देते हैं। इसमें लंबे समासों तथा नए पारिभाषिक शब्दों का भी व्यापक प्रयोग हुआ। वैदिक संस्कृत के स्वराघात की अपेक्षा लौकिक संस्कृत में बलाघात का महत्व बढ़ा। इस प्रकार लौकिक संस्कृत ने संस्कृत भाषा को एक निश्चित, व्यवस्थित, समृद्ध और विविध साहित्यिक स्वरूप प्रदान किया।