प्राकृत भाषा
उद्भव (Origin)
प्राकृत भाषा का उद्भव प्राचीन जनभाषा/लोकभाषा से हुआ। यह सामान्य जनता की स्वाभाविक भाषा थी। प्राकृत का संबंध प्राचीन वैदिक/छान्दस भाषा-परंपरा से भी जोड़ा गया है।
समय-काल (Period)
स्प्राकृत काल को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है:
- प्रथम प्राकृत-काल: ई.पू. 500 से ईस्वी सन् के आरम्भ तक
- द्वितीय प्राकृत-काल: ईस्वी सन् से 500 ई. तक
- तृतीय प्राकृत-काल: 500 ई. से 1000 ई. तक; इस काल की भाषा को अपभ्रंश कहा गया है।
विकास (Development)
प्राकृत का विकास अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने वाली लोकभाषाओं के आधार पर हुआ। आगे चलकर इसके विभिन्न रूप विकसित हुए—मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, अर्धमागधी, पैशाची आदि। बाद में प्राकृत के आगे के विकास से अपभ्रंश का रूप सामने आया।
साहित्य (Literature)
प्राकृत में धार्मिक और लौकिक दोनों प्रकार का विशाल साहित्य मिलता है। इसमें आगम साहित्य, कथा-साहित्य, चरित-साहित्य, काव्य, महाकाव्य, खण्डकाव्य, मुक्तक काव्य, गीतिकाव्य, नाटक और व्याकरण आदि शामिल हैं।
अर्थ (Meaning)
‘प्राकृत’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्राक् + कृत’ से मानी गई है। इसका अर्थ है—पहले से किया हुआ / प्राकृतिक या स्वाभाविक। सामान्यतः प्राकृत का अर्थ जन-सामान्य की स्वाभाविक भाषा है।
विशेषताएँ
- ध्वनि-सरलीकरण – संस्कृत के कठिन ध्वनि-रूप प्राकृत में सरल हो जाते हैं।
- वर्ण-परिवर्तन – शब्दों में स्वर और व्यंजन के रूप में परिवर्तन दिखाई देता है।
- संयुक्त व्यंजनों का सरलीकरण – कठिन संयुक्त व्यंजनों को सरल बनाने की प्रवृत्ति मिलती है।
- स्वरों में परिवर्तन – संस्कृत के स्वरों के स्थान पर प्राकृत में सरल स्वर-रूप मिलते हैं।
- व्यंजन-परिवर्तन – शब्दों के मध्य या अंत में व्यंजनों के रूप बदलते हैं।
- विभक्ति-रूपों में सरलता – संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत में विभक्ति-रूप अधिक सरल दिखाई देते हैं।
- संधि का सरलीकरण – संस्कृत की जटिल संधियों के स्थान पर सरल रूप मिलते हैं।
- व्याकरणिक सरलता – प्राकृत में ध्वन्यात्मक और व्याकरणात्मक सरलीकरण की प्रवृत्ति प्रमुख है।
- क्षेत्रीय विविधता – अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने के कारण मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, अर्धमागधी आदि अलग-अलग रूप विकसित हुए।
- अपभ्रंश की ओर विकास – प्राकृत के आगे के विकास में अपभ्रंश का रूप सामने आया।
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